विवाह संस्कार

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विवाह एक शुभ एवं मागलिक अवसर है, जो कि जीवन में एक बार आता है, जिसे लोग हर प्रकार से यादगार बनाने का प्रयास करते है। भगवान से प्रार्थना करते हैं कि यह शुभ कार्य बिना किसी विध्न-बाधा के उल्लास एवं आनंद के साथ हो जाए। अनेक प्रकार की तैयारीयां भी करते हैं जिसमे लाखों रूपयों का खर्च होता है। अतिथियों का विशेष ध्यान रखा जाता है, उन्हे हर प्रकार की सुविधा प्रदान की जाती है एवं हर प्रकार से उनका सत्कार किया जाता है। इस बात का विशेष ध्यान रखा जाता है कि किसी भी अतिथि को किसी भी प्रकार का कष्ट न हो। कहने का तात्पर्य यह है कि लोग सभी बातों का ध्यान रखते हैं परंतु जिन बातों का ध्यान नहीं रखते और वे सबसे ज्यादा विशेष होती है, जिससे विवाह के निर्विध्न संपन्न होने का सीधा-सीधा संबंध होता है वे निम्नलिखित है:-

1. पत्रिका मिलान के बाद सर्वप्रथम विवाह में मुर्हुत आदि पर विचार किया जाता है। यदि जल्दबाजी में या किसी कारणवश अगर विवाह अशुभ मुर्हुत में हो जाता है तो उसके परिणाम भी शुभ नहीं होते एवं जीवन भर वर-वधु को समस्याओं को सामना करना पडता है।

2. विवाह में जिस तरह अतिथि आते है, उनका सत्कार, भोजन, ठहरने आदि की व्यवस्था कि जाती है, उसी प्रकार ब्राहमण मंत्रों द्वारा देवी-देवताआंे गणेशजी, लक्ष्मीजी, गंगामाता आदि सभी को आमंत्रित करता है। उन देवी-देवताअेों का स्वागत, स्नान-ध्यान, पूजन आदि किया जाता है। और वे देवी-देवता आते भी हैं इसमें संदेह बिलकुल भी नहीं है। यह अलग बात है कि वे हमें दिखाई नहीं देते। विवाह में अग्नि एवं अन्य देवी-देवताओं को साक्षी मानकर वर एवं वधु एक दूसरे का जीवन साथी स्वीकार करते है, तथा यदि जीवन में कोई परेशानी आये तो वे देवी-देवता उनकी मदद करने के लिए तैयार रहते हैं क्योंकि उनको विवाह में निमंत्रण दिया जाता है उनको साक्षी माना जाता है।

3. यदि किसी अतिथि को बुलाया जाए एवं उसको समय न दिया जाए तो उसका अपमान होता है उसी प्रकार लोग देवी-देवताओं के पूजन में श्रद्धा से न बैठकर जल्दबाजी करते है जिससे उनका अपमान होता है।

4. देवी-देवताओें के पूजन के पश्चात् उनको दान-दक्षिणा आदि चढायी जाती है जिसमें लोग जितना हो सके कम से कम दक्षिणा देते है यहि ब्राहमण कि दक्षिणा के साथ भी होता है। इससे उनका अपमान होता है लोग शादी की तैयारी में लाखों रूपये लगाते है ओर उनको देवी-देवताओं एवं ब्राहमण को दक्षिणा देते समय परी तरह से कंजूसी का उपयोग करते है। यदि देवी-देवता और ब्राहमण संतुष्ट एवं तृप्त हो जाते हैं तो अपने-आप कार्य गणेशजी, माता लक्ष्मीजी आदि की कृपा से स्वतः निर्विध्न संपन्न हो जाते है, एवं वर-वधु को उनके जीवन को सुखमय एवं शांतिमय बनाने का आशिर्वाद प्राप्त हो जाता है।

5. विवाह जीवन में एक बार होता है अतः उसमें देवी-देवताओं को भी आमंत्रित करना चाहिए, एवं उनसे विवाह को निर्विध्न संपन्न होने की प्रार्थना करना चाहिए। आजकल जो कोर्ट-मैरिज, लव-मैरिज आदि का एक तूफान सा चल गया है उसका परिणाम यह है कि उन लोगों के जीवन में सुख-शांति आदि नहीं एवं ऐसी शादीयां अधिक समय तक रह भी नहीं पाती एवं तलाक आदि की तैयारीयां भी हो जाती है। अब लव-मैरिज एवं कोर्ट-मैरिज में तो देवी-देवताओं से कोई मतलब ही नहीं होता परिणाम तो आप सब जानते ही है की उनका दांपत्य जीवन कैसा होता है, एवं वे लोग कितने सुखी रहते हैं ?

इन सब बातों को ध्यान मे रखकर विवाह को उत्साह एवं आनंद के साथ मनाते हुए यादगार बनाने का प्रयास करना चाहिए।

विवाह करवाने दक्षिणा

यदि आप भी चाहते हैं कि आपके यहां जो विवाह ह,ै वह निर्विध्न संपन्न हो जाऐं एवं किसी भी प्रकार की कोई बाधा-परेशानी उत्पन्न न हो, वर-वधु के जीवन में सुख-शांति एवं प्रेम बना रहे तो यह अत्यंत आवश्यक है कि किसी अच्छे विद्वान ब्राहमण द्वारा विवाह संपन्न करवाया जाए। जिस प्रकार एक कोर्ट मंे चल रहे केस मे विजय दिलाने के लिए एक अच्छे वकिल का होना आवश्यक होता है, ठिक उसी प्रकार किसी विवाह में उसको निर्विध्न पूर्ण करने के लिए देवी-देवताओं को आमंत्रित करने के लिए, उनसे दंापत्य जीवन में सुख-शांति आदि के लिए आर्शिवाद प्राप्त कराने के लिए एक अच्छे विद्वान ब्राहमण का होना अनिवार्य है। अतः यदि आप भी विवाह के लिए पंडित की तलाश में हैं तो आप पंडित सुनीलजी उपाध्यायजी से संपर्क कर सकते है। ब्राहमण के संतुष्ट होते ही सभी देवी-देवता संतष्ट हो जाते हैं एवं देवी-देवताओं के संतुष्ट होते ही सभी कार्य आसानी से बिना किसी विध्न बाधा के पूर्ण हो जाते है।

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